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Bihar Cabinet Expansion: मंत्रिमंडल में जातीय समीकरण का ‘मास्टरस्ट्रोक’, लेकिन क्या कायस्थों की नाराजगी पड़ेगी भारी?

पटना। बिहार की राजनीति में कहा जाता है कि यहाँ वोट दिया नहीं, बल्कि ‘बोया’ जाता है, और उस फसल का नाम है ‘जाति’। गुरुवार को पटना के गांधी मैदान में जब सम्राट चौधरी सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ, तो उसमें विकास से ज्यादा ‘जातीय संतुलन’ की झलक दिखी। 243 सदस्यों वाली विधानसभा में अधिकतम 36 मंत्री हो सकते हैं, और इस सीमा के भीतर एनडीए ने हर वर्ग को साधने की कोशिश की है।

​लेकिन इस पूरे विस्तार में दो बातें सबसे ज्यादा चर्चा में रहीं—पहली, निशांत कुमार का उदय और दूसरी, नितिन नवीन की बिरादरी (कायस्थ) का मंत्रिमंडल से पूरी तरह बाहर होना।

​1. जातीय गणित: किसके हिस्से क्या आया?

​बिहार कैबिनेट में इस बार भाजपा के 16, जदयू के 15, लोजपा (आर) के 2, और ‘हम’ व रालोमो के 1-1 मंत्री शामिल हैं। अगर हम जातीय आधार पर देखें, तो भाजपा ने इस बार सवर्णों और ईबीसी (EBC) पर बड़ा दांव खेला है।

  • ब्राह्मण: नीतीश मिश्रा और मिथिलेश तिवारी के रूप में भाजपा ने दो ब्राह्मण चेहरे दिए हैं।
  • भूमिहार: विजय कुमार सिन्हा और इंजीनियर कुमार शैलेंद्र को जगह मिली है।
  • राजपूत: संजय टाइगर, श्रेयसी सिंह (भाजपा), लेसी सिंह (जदयू) और संजय सिंह (लोजपा-आर) के जरिए राजपूत समाज को प्रतिनिधित्व दिया गया है।
  • ओबीसी/ईबीसी: राम कृपाल यादव (यादव), भगवान सिंह कुशवाहा (कोइरी), और निशांत कुमार (कुर्मी) के साथ-साथ मल्लाह, धानुक और गंगोता समाज को भी उचित स्थान मिला है।

​2. कायस्थ समाज की ‘गुम’ हुई बिरादरी

​बिहार की राजनीति और निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले कायस्थ समाज के लिए यह विस्तार एक बड़ा झटका माना जा रहा है। पटना शहरी क्षेत्र से लंबे समय तक प्रतिनिधित्व करने वाले नितिन नवीन अब सरकार का हिस्सा नहीं हैं (उन्हें भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है)। उम्मीद थी कि उनकी जगह संजीव चौरसिया को मौका मिलेगा, लेकिन शहरी पटना से अब मंत्रिमंडल में कोई भी चेहरा नहीं है।

​सोशल मीडिया पर कायस्थ समाज के लोग अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। भाजपा इस समाज को अपना कोर वोटर मानती है, लेकिन सरकार में एक भी मंत्री पद न मिलना आने वाले समय में पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है।

​3. मंगल पांडेय का पत्ता क्यों कटा?

​भाजपा के दिग्गज नेता और पश्चिम बंगाल के प्रभारी मंगल पांडेय का नाम सूची से बाहर होना सबको चौंका गया। माना जा रहा है कि जातीय संतुलन बैठाने के फेर में उनका नाम कटा। नीतीश मिश्रा और मिथिलेश तिवारी को शामिल करने के बाद पार्टी के पास तीसरे ब्राह्मण चेहरे के लिए जगह नहीं बची थी। बंगाल चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद क्षेत्रीय समीकरण उन पर भारी पड़ गए।

​4. निशांत कुमार: ‘परिवारवाद’ के खिलाफ राजनीति का नया मोड़

​जदयू के खेमे से सबसे बड़ी खबर मुख्यमंत्री के बेटे निशांत कुमार की रही। राजनीति से दूर रहने वाले निशांत अब न केवल सरकार में हैं, बल्कि पिता नीतीश कुमार की मौजूदगी में शपथ लेकर उन्होंने उत्तराधिकार की कड़ियां भी जोड़ दी हैं। हालांकि, नीतीश कुमार हमेशा परिवारवाद के मुखर विरोधी रहे हैं, इसलिए इस कदम ने विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया है।

​5. भाजपा का मास्टर प्लान: ईबीसी और दलितों पर फोकस

​भाजपा ने इस बार दलित (लखेन्द्र पासवान, नंद किशोर राम) और ईबीसी (दिलीप जायसवाल, प्रमोद चंद्रवंशी) चेहरों को आगे बढ़ाकर साफ कर दिया है कि उसका लक्ष्य ‘साइलेंट वोटर’ है। चिराग पासवान की पार्टी से संजय पासवान और संजय सिंह को जगह देकर दलित-सवर्ण गठजोड़ को भी मजबूत करने की कोशिश की गई है।

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