बिहार में NDA का ‘अजेय’ सफर: लोकसभा और विधानसभा के बाद राज्यसभा में भी क्लीन स्वीप; क्या अब बिहार को मिलेगा भाजपा का CM?
पटना। बिहार की सियासत में इन दिनों एक नया इतिहास लिखा जा रहा है। 16 मार्च 2026 को हुए राज्यसभा की पांच सीटों के चुनाव परिणामों ने यह साफ कर दिया है कि राज्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की पकड़ अब निर्विवाद रूप से सबसे मजबूत हो चुकी है। माहिर राजनीतिक प्रबंधन के दम पर एनडीए ने उन सीटों को भी अपनी झोली में डाल लिया है, जहाँ कड़ा मुकाबला माना जा रहा था। अब भाजपा की नजरें एक ऐसे लक्ष्य पर हैं, जिसे उसने बिहार में अब तक हासिल नहीं किया है—पार्टी का अपना मुख्यमंत्री।
आंकड़ों में NDA की ताकत का प्रदर्शन
बिहार के संसदीय और विधायी ढांचे में एनडीए का वर्तमान प्रतिनिधित्व किसी भी विपक्षी दल के लिए एक बड़ी चुनौती है। आंकड़ों पर नजर डालें तो एनडीए की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है:
- लोकसभा: 2024 के आम चुनाव में बिहार की 40 सीटों में से 30 सीटें एनडीए के खाते में गईं।
- विधानसभा: 2025 के विधानसभा चुनाव में 243 सीटों में से एनडीए ने 202 सीटों पर प्रचंड जीत दर्ज की।
- राज्यसभा: हालिया चुनाव के बाद, बिहार की 16 सीटों में से 12 सांसद अब एनडीए के हैं।
भाजपा: अब ‘बड़े भाई’ की भूमिका में
2020 के विधानसभा चुनाव तक एनडीए में जदयू (JDU) को ‘बड़ा भाई’ माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। अब भाजपा न केवल संख्या बल में, बल्कि प्रभाव में भी आगे निकल चुकी है। वर्तमान विधानसभा में भाजपा के 89 विधायक हैं, जबकि जदयू के पास 85। राज्यसभा में भी भाजपा के 7 और जदयू के 4 सांसद हैं। यहाँ तक कि विधान परिषद में भी भाजपा 22 सीटों के साथ जदयू से आगे है।
अगला लक्ष्य: बिहार का अपना मुख्यमंत्री
बिहार में भाजपा ने अब तक कई बार गठबंधन सरकारें चलाई हैं, लेकिन कभी भी पार्टी का अपना मुख्यमंत्री नहीं रहा। अब इस ‘अधूरे सपने’ को पूरा करने की तैयारी तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राज्यसभा के माध्यम से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय किया जा सकता है।
कौन होगा नया चेहरा?
यदि नीतीश कुमार केंद्र की राजनीति में जाते हैं, तो बिहार में भाजपा का पहला मुख्यमंत्री कौन होगा? इस पर फिलहाल संशय बरकरार है, लेकिन सम्राट चौधरी का नाम सबसे आगे चल रहा है। सूत्रों की मानें तो पार्टी किसी अगड़ी जाति के बजाय अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से चेहरा देने की तैयारी में है, ताकि राज्य के व्यापक वोट बैंक को साधा जा सके।
निष्कर्ष
भाजपा फिलहाल ‘खरमास’ के खत्म होने का इंतजार कर रही है। माना जा रहा है कि अक्षय तृतीया के आसपास बिहार की सत्ता संरचना में कोई बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है। यदि भाजपा इस ‘मिशन मुख्यमंत्री’ में सफल होती है, तो यह बिहार के राजनीतिक इतिहास का एक नया अध्याय होगा, जहाँ पार्टी अपने बूते सरकार का नेतृत्व करेगी।



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