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​बिहार में एनडीए का प्रचंड दबदबा: विधानसभा और लोकसभा के बाद अब राज्यसभा में भी क्लीन स्वीप; क्या है भाजपा का अगला बड़ा दांव?

पटना। बिहार की सियासत में इन दिनों एक नया इतिहास लिखा जा रहा है। हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि राज्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की पकड़ न केवल मजबूत हुई है, बल्कि वह अब अजेय स्थिति में नजर आ रही है। 243 सदस्यों वाली विधानसभा में 202 विधायकों के समर्थन के साथ, एनडीए अब बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदलने की ओर अग्रसर है।

आंकड़ों में एनडीए की ताकत

​बिहार की राजनीति में एनडीए की मौजूदा ताकत का अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है:

  • लोकसभा: 2024 के चुनाव में बिहार की 40 सीटों में से 30 पर एनडीए का कब्जा है।
  • विधानसभा: 2025 के चुनाव के बाद एनडीए के पास 243 में से 202 विधायक हैं।
  • राज्यसभा: बिहार की कुल 16 राज्यसभा सीटों में से 12 अब एनडीए के पाले में हैं।

​16 मार्च 2026 को हुए राज्यसभा की पांच सीटों के चुनाव में एनडीए ने पांचों सीटों पर जीत दर्ज की। माहिर राजनीतिक प्रबंधन के कारण जिस एक सीट पर जिच फंसी थी, वह भी अंततः एनडीए की झोली में आ गई।

‘बड़े भाई’ की भूमिका में भाजपा

​बिहार में लंबे समय तक जनता दल यूनाइटेड (JDU) एनडीए के भीतर ‘बड़े भाई’ की भूमिका में रही है। लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद समीकरण बदलने शुरू हुए। वर्तमान में भाजपा ने हर मोर्चे पर जदयू को पीछे छोड़ दिया है। विधानसभा में भाजपा के पास 89 विधायक हैं जबकि जदयू के पास 85। वहीं राज्यसभा में भाजपा के 7 और जदयू के 4 सांसद हैं। विधान परिषद में भी भाजपा 22 सीटों के साथ जदयू (20 सीट) से आगे निकल चुकी है।

मिशन ‘अपना मुख्यमंत्री’: भाजपा का अगला लक्ष्य

​बिहार की राजनीति में भाजपा ने अब तक अपना मुख्यमंत्री नहीं दिया है। लेकिन मौजूदा ताकत और समीकरणों को देखते हुए पार्टी का अब एकमात्र और बड़ा लक्ष्य बिहार में ‘अपना मुख्यमंत्री’ लाना है। सूत्रों की मानें तो पार्टी के अंदर इस पर गहन मंथन चल रहा है।

​कयास लगाए जा रहे हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को केंद्र की राजनीति या राज्यसभा के माध्यम से दिल्ली भेजने की तैयारी पूरी हो चुकी है। यदि ऐसा होता है, तो बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री चेहरा सामने आएगा।

चेहरे को लेकर सस्पेंस

​भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए कई नामों पर चर्चा गर्म है। मौजूदा उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का नाम इस रेस में सबसे आगे बताया जा रहा है। हालांकि, पार्टी के रणनीतिकार किसी ऐसे चेहरे पर दांव लगाना चाहते हैं जो पिछड़ा या अति-पिछड़ा वर्ग से हो, ताकि राज्य के सामाजिक समीकरणों को साधा जा सके। करीब 10 अन्य नामों पर भी कयास लगाए जा रहे हैं, लेकिन अंतिम निर्णय ‘अक्षय तृतीया’ के बाद ही होने की संभावना है, क्योंकि वर्तमान में ‘खरमास’ के कारण भाजपा किसी बड़े बदलाव से परहेज कर रही है।

निष्कर्ष

​बिहार में एनडीए की यह जीत केवल सीटों का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह भाजपा की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह बिहार में स्वतंत्र रूप से अपनी सत्ता स्थापित करना चाहती है। यदि भाजपा अपने मुख्यमंत्री मिशन में सफल रहती है, तो यह बिहार के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ साबित होगा।

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