बिहार के किसानों पर कुदरत नहीं, बाजार की मार: ₹2 किलो पहुंचा चुकंदर, खेतों में फसल सड़ाने को मजबूर अन्नदाता
पटना/बाढ़: बिहार के पटना जिले के बाढ़ अनुमंडल से किसानों की बदहाली की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो कृषि प्रधान देश के लिए चिंता का विषय है। नवादा, ढीबर और रैली पंचायत के सैकड़ों किसानों ने इस साल बड़े अरमानों के साथ चुकंदर (Beetroot) की खेती की थी, लेकिन आज वही फसल उनके लिए गले की फांस बन गई है। मंडी में उचित दाम न मिलने के कारण किसान अपनी मेहनत की कमाई को खेतों में ही सड़ने के लिए छोड़ने या मवेशियों को खिलाने को मजबूर हैं।
लागत भी नहीं निकल रही: ₹2 से ₹5 प्रति किलो का भाव
किसानों के अनुसार, इस साल मंडी में चुकंदर की कीमत गिरकर मात्र 2 से 5 रुपये प्रति किलो रह गई है। नवादा और ढीबर पंचायत के लगभग 500 से 700 किसानों ने करीब 100 एकड़ जमीन पर चुकंदर लगाया था। किसानों का कहना है कि खेत से मंडी तक फसल ले जाने का भाड़ा और मजदूरी ही चुकंदर की बिक्री कीमत से अधिक बैठ रही है। ऐसे में फसल बेचना मुनाफे के बजाय अतिरिक्त घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
पिछली बार की तुलना में भारी गिरावट
किसान धर्मवीर कुमार ने बताया कि पिछले वर्ष शुरुआती दौर में उन्हें ₹20 प्रति किलो और अंत तक ₹10 प्रति किलो का भाव मिला था। लेकिन इस साल शुरुआत ही ₹7 से हुई और अब यह ₹2 पर सिमट गई है। धर्मवीर ने दो बीघा में खेती की है जिसमें करीब 2 लाख रुपये की लागत आई है। मंगलवार को जब वे दो बोरा चुकंदर मंडी लेकर गए, तो उन्हें महज ₹2 किलो का भाव मिला, जिससे उनकी उम्मीदें टूट गईं।
मवेशियों का चारा बना चुकंदर, ट्रैक्टर से जुतवा रहे खेत
बाढ़ के इन पंचायतों में अब अजीबोगरीब स्थिति है। भारी निवेश और मेहनत के बाद तैयार फसल का उपयोग अब इस तरह हो रहा है:
- पशु चारा: किसान मीना देवी जैसी कई महिलाएं चुकंदर को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर अपनी गाय और भैंसों को खिला रही हैं। हालांकि, फसल इतनी ज्यादा है कि मवेशी भी इसे पूरा नहीं खा सकते।
- जैविक खाद: किसान राम महतो ने अपनी डेढ़ बीघा फसल पर ट्रैक्टर चलवा दिया है। वे चुकंदर को उखाड़कर खेत में ही छोड़ रहे हैं ताकि वह सड़कर खाद बन जाए और अगली फसल (मक्का) के लिए जमीन तैयार हो सके।
- मक्का की बुवाई: कई किसानों ने खेत खाली करने के लिए खड़ी फसल को बर्बाद कर दिया है ताकि समय पर मक्का की पैदावार ली जा सके।
कर्ज और पट्टे की जमीन का बोझ
इलाके के अधिकांश किसान पट्टे (Rent) पर जमीन लेकर खेती करते हैं। बीज, खाद और सिंचाई की बढ़ती कीमतों के कारण इस बार लागत पिछले वर्षों के मुकाबले काफी अधिक आई थी। फसल बर्बाद होने से किसानों के सामने अब साहूकारों का कर्ज चुकाने और परिवार का भरण-पोषण करने का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। स्थानीय किसानों का कहना है कि अगर सरकार या प्रशासन की ओर से कोल्ड स्टोरेज या उचित बाजार की व्यवस्था होती, तो आज उन्हें अपनी फसल को कचरा समझकर फेंकना नहीं पड़ता।
निष्कर्ष
बाढ़ के किसानों की यह कहानी बिहार के कृषि संकट का एक छोटा सा हिस्सा है। उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या बेहतर मार्केट लिंकेज न होने के कारण अक्सर किसानों को इसी तरह की स्थिति का सामना करना पड़ता है। फिलहाल, सैकड़ों एकड़ में लहलहाती चुकंदर की लाल फसल अब मिट्टी में मिलकर काली हो रही है।



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