बिहार का वह रहस्यमयी धाम, जहां लगता है ‘भूतों का मेला’; यूपी, बंगाल और नेपाल से खिंचे चले आते हैं लोग
गोपालगंज (बिहार)। आधुनिकता और विज्ञान के इस युग में भी भारत के कुछ हिस्सों में प्राचीन मान्यताएं और रहस्यमयी परंपराएं आज भी जीवित हैं। बिहार के गोपालगंज जिले में स्थित लक्षवार धाम एक ऐसा ही स्थान है, जो शारदीय नवरात्र के दौरान चर्चा का केंद्र बन जाता है। यहां एक ऐसा ‘मेला’ लगता है, जिसे स्थानीय लोग ‘भूतों का मेला’ कहते हैं। आस्था, अंधविश्वास और विचलित करने वाले दृश्यों के बीच यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं।
लक्षवार धाम: आस्था या गहरा अंधविश्वास?
जिला मुख्यालय से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित लक्षवार गांव का यह धाम दशकों से अपनी एक खास पहचान रखता है। शारदीय नवरात्र के शुरू होते ही यहां का नजारा पूरी तरह बदल जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान ‘प्रेतबाधा’ से मुक्ति का केंद्र है। लोग दूर-दराज के क्षेत्रों से अपने परिजनों को लेकर यहां आते हैं, जिन्हें वे मानसिक रूप से अस्वस्थ या ‘ऊपरी हवा’ का शिकार मानते हैं।
देश-विदेश तक फैला है प्रभाव
लक्षवार धाम की प्रसिद्धि केवल गोपालगंज या बिहार तक सीमित नहीं है। नवरात्र के दौरान यहां उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। लगभग एक महीने तक चलने वाले इस जमावड़े में श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास देखने को मिलता है। यहां की मिट्टी और ‘ललका बाबा’ द्वारा दी जाने वाली भभूत को चमत्कारी माना जाता है। भक्तों का मानना है कि यहां की मिट्टी के स्पर्श मात्र से शरीर के भीतर की नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं।
विचलित करने वाले दृश्य और अजीबोगरीब व्यवहार
मेले के दौरान मंदिर परिसर में ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जो किसी को भी हैरान कर सकते हैं। कहीं महिलाएं बेसुध होकर सिर हिलाती नजर आती हैं, तो कहीं पुरुष जमीन पर लोटकर अजीबोगरीब हरकतें करते दिखते हैं।
अंधविश्वास का आलम यह है कि लोग मर्यादा और लोक-लाज की परवाह किए बिना घंटों तक इन क्रियाओं में लीन रहते हैं। वे इसे अपनी पीड़ा से मुक्ति पाने का एकमात्र मार्ग मानते हैं। मंदिर के पुजारी के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1972 में हुई थी, जब लक्षवार शक्तिपीठ के एक अंश से कुचायकोट के जलालपुर बाजार में शिवधाम की स्थापना की गई थी।
विज्ञान बनाम मान्यता
जहां एक ओर हजारों श्रद्धालु इसे दैवीय चमत्कार और शक्तिपीठ की महिमा मानते हैं, वहीं चिकित्सा विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक इसे एक अलग नजरिए से देखते हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य: डॉक्टरों का मानना है कि जिसे लोग ‘भूत-प्रेत’ मान रहे हैं, वह अक्सर हिस्टीरिया (Hysteria), सिजोफ्रेनिया या अन्य गंभीर मानसिक विकार हो सकते हैं।
- सामूहिक धारणा: मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, एक ही स्थान पर कई लोगों को एक जैसा व्यवहार करते देखकर अन्य लोग भी उसी मानसिक स्थिति (Mass Hysteria) में चले जाते हैं।
- सामाजिक प्रभाव: जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच न होना भी लोगों को ऐसे स्थानों की ओर धकेलता है।
प्रशासन और जागरूकता की चुनौती
हर साल बढ़ती भीड़ को देखते हुए स्थानीय प्रशासन के लिए सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है। हालांकि लोग इसे अपनी निजी आस्था का विषय मानते हैं, लेकिन बुद्धिजीवियों का मानना है कि समाज को मानसिक रोगों के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है ताकि लोग अंधविश्वास के बजाय सही उपचार की ओर बढ़ सकें।
मुख्य हाइलाइट्स:
- स्थान: लक्षवार धाम, गोपालगंज (बिहार)।
- विशेषता: नवरात्र में प्रेतबाधा मुक्ति का दावा।
- आगमन: यूपी, बंगाल और नेपाल से हजारों श्रद्धालु।
- इतिहास: 1972 से शिवधाम की स्थापना के बाद बढ़ा प्रभाव।



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