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जहानाबाद: सैरात पर ‘संग्राम’, एक ही जमीन पर दो-दो दावेदार; DDC ने नगर पंचायत की बंदोबस्ती को किया रद्द

जहानाबाद (बिहार): बिहार के जहानाबाद जिले में सरकारी जमीन के राजस्व को लेकर दो बड़े प्रशासनिक निकायों के बीच ‘मूंछ की लड़ाई’ छिड़ गई है। मामला घोषी नगर पंचायत के सैरात (हाट-बाजार) की बंदोबस्ती से जुड़ा है, जहाँ जिला परिषद और नगर पंचायत एक ही जमीन पर अपना-अपना हक जता रहे हैं। इस विवाद ने तब तूल पकड़ लिया जब एक ही जमीन के लिए दो अलग-अलग निविदाएं (Tenders) जारी कर दी गईं।

क्या है पूरा मामला?

​बिहार में अक्सर कहावत कही जाती है— “माल महाराज के, मिर्जा खेले होली”। जहानाबाद के घोषी में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। घोषी नगर पंचायत मुख्यालय में स्थित सैरात की जमीन खतियान के अनुसार जिला परिषद जहानाबाद की स्वामित्व वाली जमीन है। नियमतः हर साल जिला परिषद इसकी बंदोबस्ती (Auction) कर राजस्व वसूलता है।

​इस वित्तीय वर्ष में भी जिला परिषद ने विधिवत विज्ञापन निकालकर बंदोबस्ती की प्रक्रिया शुरू की थी। लेकिन इसी बीच नगर पंचायत घोषी के कार्यपालक पदाधिकारी ने भी उसी जमीन पर सैरात वसूली के लिए अपनी ओर से निविदा जारी कर दी और बंदोबस्ती की प्रक्रिया पूरी कर ली।

DDC डॉ. प्रीति का कड़ा एक्शन

​जैसे ही यह मामला जिला प्रशासन के संज्ञान में आया, उप विकास आयुक्त (DDC) सह जिला परिषद की कार्यपालक पदाधिकारी डॉ. प्रीति एक्शन मोड में आ गईं। उन्होंने नगर पंचायत द्वारा की गई इस समानांतर बंदोबस्ती को पूरी तरह अवैध करार देते हुए तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है।

​इतना ही नहीं, DDC ने इसे गंभीर प्रशासनिक चूक और नियमों का उल्लंघन मानते हुए नगर पंचायत घोषी के कार्यपालक पदाधिकारी से 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है। आदेश में साफ कहा गया है कि बिना स्वामित्व के बंदोबस्ती करना वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है।

कानून और अधिनियम का पेंच

​इस विवाद के केंद्र में दो अलग-अलग व्याख्याएं हैं:

  1. जिला परिषद का पक्ष: अधिकारियों ने बिहार नगर पालिका अधिनियम 2007 की धारा 100 का हवाला दिया है। इसके तहत जिला परिषद की कोई भी परिसंपत्ति (Asset) नगर निगम, नगर परिषद या नगर पंचायत के अधीन स्वतः नहीं चली जाती। जब तक जमीन का हस्तांतरण न हो, उस पर मालिकाना हक जिला परिषद का ही रहता है।
  2. नगर पंचायत का पक्ष: वहीं, नगर पंचायत घोषी के मुख्य पार्षद का तर्क है कि नगर पंचायत क्षेत्र की सीमा के भीतर आने वाली कोई भी सार्वजनिक या खाली जमीन नगर निकाय की संपत्ति मानी जाती है। उनका दावा है कि इस संबंध में पूर्व में भी कुछ सरकारी आदेश जारी हुए हैं।

राजस्व का नुकसान और प्रशासनिक टकराव

​इस टकराव की वजह से स्थानीय व्यापारियों और ठेकेदारों के बीच भी भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। एक ही जमीन पर दो निकायों के दावों से न केवल राजस्व संग्रह बाधित हो रहा है, बल्कि विकास कार्यों पर भी इसका असर पड़ सकता है। फिलहाल, DDC के कड़े रुख के बाद नगर पंचायत बैकफुट पर नजर आ रही है, लेकिन कानूनी लड़ाई लंबी खिंच सकती है।

​जहानाबाद का यह मामला बिहार के अन्य जिलों के लिए भी एक नजीर बन सकता है, जहाँ शहरी निकायों के विस्तार के बाद जिला परिषद की संपत्तियों के स्वामित्व को लेकर अक्सर खींचतान बनी रहती है।

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