बिहार राज्य आवास बोर्ड का ‘तिलस्मी’ खेल: स्कीम बंद करने का आदेश, फिर भी गुपचुप लिए गए आवेदन
पटना: बिहार राज्य आवास बोर्ड (BSHB) इन दिनों अपने अजीबोगरीब कारनामों के कारण चर्चा में है। जहाँ एक तरफ बोर्ड ने आधिकारिक तौर पर आवासीय भूखंड (Plots) की योजना को स्थगित करने का पत्र जारी किया, वहीं दूसरी ओर बोर्ड के डिजिटल पोर्टल पर आवेदन लेने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। इस ‘तिलस्मी’ खेल ने न केवल आम जनता को गुमराह किया है, बल्कि बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
आमतौर पर जब नोएडा, ग्रेटर नोएडा या डीडीए (DDA) जैसी संस्थाएं हाउसिंग स्कीम लाती हैं, तो उसका व्यापक प्रचार-प्रसार होता है। लेकिन बिहार राज्य आवास बोर्ड की इस योजना की भनक ‘जानकारों’ को भी नहीं लगी।
हैरानी की बात यह है कि बोर्ड की एक वेबसाइट पर योजना के बंद होने की घोषणा की गई और बाकायदा स्थगन आदेश का पत्र अपलोड किया गया। परंतु, वास्तव में जिस पोर्टल से आवेदन स्वीकार किए जा रहे थे, वहां तकनीकी रूप से कोई बदलाव नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि लोग स्थगन आदेश के बाद भी ऑनलाइन फॉर्म भरते रहे और आवेदन शुल्क जमा करते रहे।
मुख्यमंत्री और दिग्गज नेताओं के नाम पर फर्जीवाड़ा?
इस खेल का सबसे चौंकाने वाला पहलू आवेदकों की सूची है। ‘अमर उजाला’ की पड़ताल में सामने आया है कि 19 फरवरी—जो आवेदन की अंतिम तिथि थी—उस दिन नीतीश कुमार और डॉ. प्रेम कुमार जैसे नामों से आवेदन दर्ज किए गए।
- 18 और 19 फरवरी को हुए आवेदन: इन दो दिनों में राजीव रंजन झा, नीतीश कुमार, प्रेम कुमार, अनिल कुमार रमण, विक्रम कुमार, आदित्य राज, तान्या रॉय और इंद्रजीत कुमार के नाम से आवेदन आए।
- साजिश की आशंका: यह संभव नहीं लगता कि मुख्यमंत्री या विधानसभा अध्यक्ष को इन भूखंडों की आवश्यकता हो। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि या तो यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है या पोर्टल की खामियों का फायदा उठाकर फर्जी डेटा फीड किया गया है।
आम जनता के पैसों का क्या होगा?
सबसे बड़ा सवाल उन वास्तविक आवेदकों का है जिन्होंने जानकारी के अभाव में पैसे जमा कर दिए। आवास बोर्ड अक्सर ऐसी स्थितियों में पल्ला झाड़ लेता है। बोर्ड की पुरानी दलीलें रही हैं कि “जब सूचना जारी कर दी गई थी, तो आवेदन नहीं करना चाहिए था।” ऐसे में आवेदकों द्वारा जमा की गई राशि वापस मिलेगी या नहीं, इस पर फिलहाल सस्पेंस बरकरार है।
सुधार के नाम पर सिर्फ ‘बहाना’
इस मामले पर जब जिम्मेदार अधिकारियों से बात की गई, तो उन्होंने सुधार के लिए समय मांगा। कभी विधानमंडल सत्र तो कभी त्योहारों का बहाना बनाकर मामले को टाला जाता रहा। लेकिन धरातल पर पोर्टल का ‘खेल’ चलता रहा, जिससे स्पष्ट होता है कि सिस्टम में पारदर्शिता की भारी कमी है।



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