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​Bihar Rajya Sabha Election 2026: पांचवीं सीट पर फंसा पेंच, एनडीए और महागठबंधन में शह-मात का खेल; समझें पूरा गणित:-

पटना: बिहार की सियासत में एक बार फिर राज्यसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है। आगामी 16 मार्च को होने वाले चुनाव में पांच सीटों के लिए बिसात बिछ चुकी है। जहां चार सीटों पर एनडीए (NDA) अपनी मजबूत स्थिति के कारण आश्वस्त नजर आ रहा है, वहीं पांचवीं सीट को लेकर एनडीए और महागठबंधन के बीच ‘नूरा-कुश्ती’ और सियासी जुगाड़ का दौर शुरू हो गया है।

क्या है जीत का समीकरण?

​बिहार विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, राज्यसभा में एक सदस्य भेजने के लिए कम से कम 41 प्रथम वरीयता के वोटों की आवश्यकता होती है। कुल पांच सीटों के लिए निर्वाचन होना है, जिसके लिए कुल 205 विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी।

  • NDA की स्थिति: एनडीए खेमे के पास वर्तमान में 202 विधायक हैं। इस लिहाज से चार सदस्यों को राज्यसभा भेजने में एनडीए को कोई कठिनाई नहीं होगी (41 x 4 = 164)। चार सीटें सुरक्षित करने के बाद एनडीए के पास 38 अतिरिक्त वोट बचते हैं। पांचवीं सीट हासिल करने के लिए उन्हें केवल 3 और वोटों की दरकार है।
  • महागठबंधन की चुनौती: दूसरी ओर, महागठबंधन की स्थिति थोड़ी पेचीदा है। राजद (RJD) के पास फिलहाल 25 सीटें हैं और यदि पूरे महागठबंधन (कांग्रेस और वाम दल) के मतों को जोड़ दिया जाए, तो यह संख्या 35 तक पहुंचती है। राज्यसभा सीट के लिए आवश्यक 41 के जादूई आंकड़े से महागठबंधन अभी भी 6 वोट दूर है।

ओवैसी की पार्टी (AIMIM) बनी ‘किंगमेकर’?

​पांचवीं सीट की इस लड़ाई में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM और बसपा (BSP) की भूमिका निर्णायक हो गई है। महागठबंधन इस गणित को साधने की कोशिश में है कि यदि AIMIM के 5 और बसपा के 1 विधायक का समर्थन मिल जाए, तो उनकी संख्या 41 (35 + 6) हो जाएगी।

​इसी रणनीति के तहत राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने हीना शहाब को राज्यसभा भेजने का कार्ड खेला है, ताकि मुस्लिम मतों और अन्य छोटे दलों को एकजुट किया जा सके। हालांकि, राह इतनी आसान नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव के बाद राजद और AIMIM के रिश्तों में काफी कड़वाहट आई थी। AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल ईमान ने पहले ही घोषणा कर दी है कि उनकी पार्टी अपना उम्मीदवार उतारेगी।

एनडीए का पलड़ा क्यों भारी है?

​आंकड़ों के खेल में एनडीए काफी फायदे में दिख रहा है। उसे अपनी पांचवीं सीट पक्की करने के लिए केवल 3 और विधायकों के समर्थन की जरूरत है, जिसे निर्दलीय या विपक्षी खेमे में सेंधमारी के जरिए आसानी से जुटाया जा सकता है। वहीं, महागठबंधन के भीतर एकजुटता की कमी और ओवैसी की पार्टी के साथ उनके पुराने विवाद का सीधा फायदा एनडीए को मिलता दिख रहा है।

​राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि महागठबंधन और AIMIM के बीच तालमेल नहीं बैठा, तो पांचवीं सीट भी आसानी से एनडीए की झोली में जा सकती है। 16 मार्च को होने वाला यह मतदान तय करेगा कि बिहार की इस ‘पावर पॉलिटिक्स’ में किसका जुगाड़ भारी पड़ता है।

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