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​दरभंगा डीएमसीएच में सिस्टम शर्मसार: स्टाफ बना तमाशाबीन, निजी ब्लेड से काट रहे मासूम बच्चों का कॉलेज

दरभंगा (बिहार): उत्तर बिहार के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र माने जाने वाले दरभंगा मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (DMCH) से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। अस्पताल के ऑर्थोपेडिक (हड्डी) विभाग में संवेदनहीनता की सारी हदें पार हो गई हैं। यहाँ मरीजों का प्लास्टर काटने के लिए तैनात कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय परिजनों को हाथ में ब्लेड थमा दे रहे हैं।

​हैरानी की बात यह है कि मासूम बच्चों के परिजन खुद अपने हाथों से प्लास्टर काट रहे हैं, जिससे बच्चों को गंभीर चोट लगने का खतरा बना हुआ है।

“मैडम ने कहा खुद काट लो प्लास्टर”

​गुरुवार को DMCH के ऑर्थो विभाग के बाहर का नजारा किसी को भी विचलित कर सकता था। मुस्कान कुमारी नाम की एक महिला अपने मासूम बच्चे को गोद में लेकर प्लास्टर कटवाने पहुंची थी। अस्पताल के नियम के मुताबिक यह काम प्रशिक्षित स्टाफ का है, लेकिन मुस्कान को दो टूक कह दिया गया— “अपने हाथ से प्लास्टर काट लीजिए, तब डॉक्टर देखेंगे।”

​मजबूर मां अपने बच्चे के इलाज की उम्मीद में खुद ही प्लास्टर काटने में जुट गई। सिर्फ मुस्कान ही नहीं, विभाग के बाहर आधा दर्जन से अधिक लोग इसी तरह अपने मरीजों के हाथ-पैर के प्लास्टर ब्लेड से काटते नजर आए।

तकनीकी काम में जानलेवा जोखिम

​चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्लास्टर काटना एक तकनीकी प्रक्रिया (Technical Process) है। इसके लिए विशेष कटर और प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होती है।

  • चोट का खतरा: साधारण ब्लेड से प्लास्टर काटते समय हाथ फिसलने पर मरीज की त्वचा गहराई तक कट सकती है।
  • संक्रमण: जंग लगे या गंदे ब्लेड का इस्तेमाल करने से जख्म में संक्रमण (Infection) फैलने का डर रहता है।
  • मासूमों पर खतरा: छोटे बच्चे अक्सर प्लास्टर कटवाते समय हिलते-डुलते हैं, ऐसे में परिजनों द्वारा ब्लेड चलाना किसी बड़े हादसे को दावत देने जैसा है।

जिम्मेदारी से भागता अस्पताल प्रशासन

​जब इस गंभीर लापरवाही की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, तो हड़कंप मच गया। मामले की जानकारी के लिए जब डीएमसीएच के अधीक्षक डॉ. जगदीशचंद्रा से संपर्क किया गया, तो उन्होंने चौंकाने वाली चुप्पी साधे रखी। साक्ष्यों को देखने के बाद भी उन्होंने कोई ठोस कार्रवाई करने के बजाय गेंद ऑर्थो विभागाध्यक्ष के पाले में डाल दी। उन्होंने केवल इतना कहा कि यह विभाग की जिम्मेदारी है, जबकि अस्पताल की समग्र व्यवस्था का जिम्मा अधीक्षक का होता है।

सवालों के घेरे में ‘मिशन 60 दिन’

​बिहार सरकार राज्य के अस्पतालों की सूरत बदलने के लिए ‘मिशन 60 दिन’ जैसे दावे कर रही है, लेकिन DMCH की यह जमीनी हकीकत दावों के विपरीत है। करोड़ों के बजट और भारी-भरकम स्टाफ के बावजूद अगर गरीब जनता को खुद ही ‘डॉक्टर’ बनना पड़ रहा है, तो यह सिस्टम की सबसे बड़ी विफलता है।

​स्थानीय लोगों और मरीजों के परिजनों ने स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री से मांग की है कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और ड्यूटी से गायब रहने वाले या काम से जी चुराने वाले स्टाफ पर सख्त कार्रवाई हो।

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