छपरा: 8 साल, करोड़ों का बजट, फिर भी फाइलों में कैद ‘वेंडिंग जोन’ योजना; आखिर कब तक उजड़ेंगे फुटपाथी दुकानदार?
बिहार (छपरा): विकास की फाइलें जब सरकारी दफ्तरों की धूल फांकने लगती हैं, तो उसका खामियाजा सड़क पर बैठे उस गरीब को भुगतना पड़ता है जो रोज कमाता और रोज खाता है। सारण जिले के छपरा शहर में ‘वेंडिंग जोन’ की योजना इसका जीवंत उदाहरण है। पिछले आठ वर्षों से यह योजना कागजों से बाहर नहीं निकल पाई है, जबकि सड़कों पर अतिक्रमण हटाने के नाम पर बुलडोजर का प्रहार लगातार जारी है।
योजना की विफलता और प्रशासनिक लापरवाही
करीब आठ साल पहले शहर की यातायात व्यवस्था को सुधारने और फुटपाथी दुकानदारों को व्यवस्थित करने के लिए वेंडिंग जोन का खाका खींचा गया था। जिला शहरी विकास अभिकरण (DUDA) के माध्यम से लगभग 1.5 करोड़ रुपये की राशि भी आवंटित की गई। निर्माण कार्य शुरू भी हुआ, लेकिन एक ऐसी चूक सामने आई जिसने पूरी योजना पर पानी फेर दिया।
प्रशासन ने जिस जमीन पर निर्माण शुरू कराया, वह ‘बेतिया राज’ की थी और इसके लिए कोई अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) नहीं लिया गया था। बिना भूमि स्वामित्व की जांच किए बजट खर्च कर देना प्रशासनिक दूरदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। नतीजा यह हुआ कि काम बीच में ही रुक गया और आज वह ढांचा खंडहर में तब्दील हो रहा है।
सर्वे के नाम पर अवैध वसूली के आरोप
योजना के तहत शहर के लगभग 2100 दुकानदारों को चिन्हित किया जाना था, जिनमें से 1200 का बायोमेट्रिक सर्वे हुआ। लेकिन इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की दीमक लग गई। आरोप लगे कि सर्वे कर्मियों ने दुकानदारों से अवैध वसूली की। जब मामला तूल पकड़ा, तो प्रशासन ने सर्वे को ही अमान्य कर दिया। आश्चर्य की बात यह है कि इस अनियमितता के लिए आज तक किसी अधिकारी या कर्मचारी की जवाबदेही तय नहीं की गई।
पुनर्वास के बिना उजाड़ना कितना जायज?
एक तरफ वेंडिंग जोन की फाइलें दबी हैं, तो दूसरी तरफ नगर निगम का बुलडोजर सड़कों पर सक्रिय है। सलेमपुर चौक से कोर्ट रोड तक हर दिन अतिक्रमण हटाओ अभियान चलता है। फुटपाथी दुकानदारों का कहना है कि वे भी शहर को साफ देखना चाहते हैं, लेकिन बिना वैकल्पिक व्यवस्था के उन्हें हटाना उनके पेट पर लात मारने जैसा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, बिना पुनर्वास के दुकानदारों को हटाना न्यायालय के दिशा-निर्देशों का भी उल्लंघन है।
शहर में जाम और पार्किंग की विकराल समस्या
छपरा की मुख्य सड़कों पर पिछले पांच सालों में वाहनों का दबाव 40% तक बढ़ा है, लेकिन सड़कों का विस्तार शून्य रहा है। गांधी चौक, नेहरू चौक और प्रेमा टॉकीज रोड जैसे इलाकों में अवैध पार्किंग और बेतरतीब ठेलों के कारण घंटों जाम लगा रहता है। यदि चिन्हित 8 स्थानों पर वेंडिंग जोन बन जाते, तो न केवल 500 से अधिक दुकानदारों को छत मिलती, बल्कि सड़कों से 30% ट्रैफिक का दबाव भी कम हो जाता।
निष्कर्ष: जवाबदेही किसकी?
अवकाश प्राप्त विंग कमांडर डॉ. बी.एन.पी. सिंह जैसे प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि यह केवल धन की बर्बादी नहीं, बल्कि एक पूरी व्यवस्था की विफलता है। राजेंद्र सरोवर, कचहरी रोड और भगवान बाजार जैसे क्षेत्रों में चिन्हित जमीनें आज भी खाली पड़ी हैं।
सवाल यह है कि क्या नगर निगम और जिला प्रशासन इस योजना को पुनर्जीवित करने की इच्छाशक्ति दिखाएगा? या फिर गरीब दुकानदार यूं ही ‘अतिक्रमण’ के नाम पर बेघर होते रहेंगे?



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