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बिहार में बड़े सियासी उलटफेर की तैयारी: नीतीश के जरिए BJP साधेगी JDU का असंतोष, क्या निशांत बनेंगे डिप्टी CM?

बिहार की राजनीति में नए युग का सूत्रपात

​बिहार की सियासत इस वक्त अपने सबसे बड़े ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। दशकों तक गठबंधन की राजनीति के धुरी रहे नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की सुगबुगाहट के साथ ही ‘नीतीश युग’ के अंत के संकेत मिलने लगे हैं। इस खाली स्थान को भरने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी बिसात बिछा दी है। भाजपा का लक्ष्य न केवल राज्य में अपना पहला मुख्यमंत्री बनाना है, बल्कि जनता दल यूनाइटेड (JDU) के भीतर पनप रहे अविश्वास और टूट के खतरे को भी कुशलता से संभालना है।

नीतीश के जरिए ही ‘कांटा’ निकालने की रणनीति

​JDU के भीतर इस समय भारी उथल-पुथल है। पार्टी के कई दिग्गज नेता और कार्यकर्ता भविष्य को लेकर आशंकित हैं। ऐसे में भाजपा नेतृत्व ने तय किया है कि JDU के असंतोष को नीतीश कुमार के माध्यम से ही शांत किया जाएगा। संदेश साफ है—नई सरकार का गठन और नेतृत्व परिवर्तन नीतीश की सहमति और उनके सम्मान को बरकरार रखते हुए होगा।

​पार्टी के भीतर संजय झा और ललन सिंह जैसे नेताओं के प्रति बढ़ते गुस्से को देखते हुए भाजपा फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। अशोक चौधरी, विजय चौधरी और श्रवण कुमार जैसे ओबीसी-एससी चेहरों की चुप्पी किसी बड़े तूफान का संकेत दे सकती है, जिसे थामने की जिम्मेदारी फिलहाल नीतीश कुमार के कंधों पर ही है।

क्यों मुफीद है भाजपा के लिए यह समय?

​भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि बिहार की सत्ता की कमान संभालने का यह सबसे सही समय है:

  1. विपक्ष की कमजोरी: हालिया हार के बाद राजद (RJD) का मनोबल गिरा हुआ है।
  2. लालू परिवार में आंतरिक कलह: राजद के भीतर चल रही जंग ने उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
  3. जनाधार का विस्तार: पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने बिहार के जटिल जातीय समीकरणों (Social Engineering) पर कड़ी मेहनत की है।

सबसे बड़ी चुनौती: कद्दावर चेहरे की तलाश

​भले ही भाजपा विधानसभा में 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन उसके सामने सबसे बड़ा संकट एक ऐसे ‘कद्दावर नेता’ का है जिसकी स्वीकार्यता पूरे बिहार में हो। पार्टी अब तक पिछड़ा वर्ग से ऐसा कोई सर्वमान्य चेहरा पेश नहीं कर पाई है जो नीतीश कुमार के कद की बराबरी कर सके। नई सरकार में सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा ऐसा मुख्यमंत्री चुनना होगा जो न केवल प्रशासन चलाए, बल्कि JDU के नाराज धड़े में भी भरोसा पैदा करे।

क्या होगी नीतीश और निशांत की भूमिका?

​सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि नीतीश कुमार का अगला पड़ाव दिल्ली होगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्हें केंद्र में उपप्रधानमंत्री या कोई अन्य गरिमामय पद दिया जा सकता है। वहीं, JDU को एकजुट रखने के लिए नीतीश के बेटे निशांत कुमार को राजनीति में सक्रिय किया जा सकता है। संभावना जताई जा रही है कि नई सरकार में JDU के कोटे से दो उपमुख्यमंत्री होंगे, जिनमें से एक नाम निशांत कुमार का हो सकता है।

निष्कर्ष: 10 अप्रैल के बाद बदलेगी तस्वीर

​नीतीश कुमार का राज्यसभा कार्यकाल 10 अप्रैल से शुरू होना संभावित है। सूत्रों के अनुसार, नामांकन के बाद से लेकर शपथ ग्रहण तक, नीतीश कुमार खुद कार्यकर्ताओं के भ्रम को दूर करेंगे। भाजपा यह सुनिश्चित करना चाहती है कि सत्ता का हस्तांतरण इतना सुगम हो कि जनता के बीच यह संदेश जाए कि “सबकुछ नीतीश की इच्छा से हो रहा है।”

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